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सुभारती आंदोलन की जनक संघमाता ‘‘डा. मुक्ति भटनागर‘‘ पंचतत्व में विलीन

मेरठ-बौद्ध रिति रिवाज के अनुसार सूरज कुण्ड में हुआ मृत्यु संस्कार। नम आंखों से सुभारती ग्रुप सहित मेरठ वासियों ने दी अंतिम विदाई। वियतनाम बुद्धिस्ट संघ के प्रथम संघ राजा थिक ट्री कुआंग, वियतनाम बुद्धिस्ट विश्वविद्यालय के कुलपति थिक ना थू एवं म्यांमार के राजदूत मियो औग ने शोक पत्र के माध्यम से अपनी संवेदनाए प्रकट की।

मेरठ। क्रान्तिधरा मेरठ में चिकित्सा, शिक्षा एवं समाज सेवा के क्षेत्र में अमूल्य योगदान देने वाले सुभारती विश्वविद्यालय मेरठ व देहरादून की संस्थापिका संघमाता डा. मुक्ति भटनागर का सोमवार दिनांक 07.06.2021 को परिनिर्वाण हो गया।
डा. मुक्ति भटनागर पेशे से फिज़िशियन थी और म्यांमार की सर्वोच्च संघ परिषद के महासचिव के द्वारा 2018 में बौद्ध अध्ययन के क्षेत्र में अतुल्य योगदान हेतु उन्हें संघ माता की उपाधि से सम्मानित किया गया था। डा. मुक्ति भटनागर ने सुभारती विश्वविद्यालय की स्थापना का शुभारंभ ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे छोटे चिकित्सा केन्द्र एवं विद्यालयों को स्थापित करके जनमानस को लाभान्वित करने के साथ किया था और अपनी सेवाओं के संगम से उन्होंने सुभारती विश्वविद्यालय मेरठ व देहरादून के रूप समाज को उन्नति का मार्ग दिया। उनके परिनिर्वाण से सुभारती परिवार सहित देश विदेशों में शोक की लहर दौड़ पड़ी। कोरोना के दृष्टिगत सुभारती परिवार की ओर से लोगो से अपने घरो में ही रहकर प्रार्थना करने का निवेदन किया गया था। वियतनाम बुद्धिस्ट संघ के प्रथम संघ राजा थिक ट्री कुआंग, वियतनाम बुद्धिस्ट विश्वविद्यालय के कुलपति थिक ना थू एवं म्यांमार के राजदूत मियो औग ने शोक पत्र के माध्यम से अपनी संवेदनाए प्रकट की। मेरठ सहित देशभर के राजनैतिक, सामाजिक संगठनों ने शोक प्रकट करते हुए शोकाकुल परिवार के लिये असीम दुख सहन करने की प्रार्थना की।

सूरज कुण्ड में सुबह 11ः30 बजे बौद्ध रिति रिवाज से भंते डा. चन्द्रकीर्त के द्वारा उनका मृत्यु संस्कार किया गया। सिख धर्म गुरूओं ने भी अरदास किया। मेरठ शहर के उपस्थ्ति लोगो ने अपने धर्म व रिति रिवाज के अनुसार संघ माता डा. मुक्ति भटनागर को श्रद्धांजलि अर्पित की। डा. मुक्ति भटनागर के पति सुभारती ग्रुप के संस्थापक डा. अतुल कृष्ण बौद्ध ने पार्थिव शरीर को मुखाग्नि दी।

डा. मुक्ति भटनागर पिछले 7 वर्षों से छाती के कैंसर से पीड़ित थी और एम्स दिल्ली में उनका आपरेशन हुआ था और उसके बाद उन्हें कीमो और रेडियो थेरेपी दी गई। उसके बाद से उनके छाती के कैंसर का रोग पूरी तरह से काबू में था और उन्होंने सुभारती के विभिन्न कार्यक्रमों एवं सामाजिक कार्यक्रमों में भाग लेना आरम्भ कर दिया था। परन्तु कोविड काल शुरू होने पर उनकी लगभग 64 वर्ष आयु के कारण उन्होंने घर से निकलना बंद कर रखा था। उनका पुत्र डा. कृष्णा मूर्ति सुभारती कोविड अस्पताल में उप-चिकित्सा अधिकारी होने के नाते कोविड रोगियों के इलाज का संचालन कर रहा था। वह हर मरीज से व्यक्तिगत रूप से मिलकर उनका इलाज करता था। इस मध्य डा. अतुल कृष्ण देहरादून में थे परन्तु 23 अप्रैल को मेरठ आ गये और 24 अप्रैल से उन्होंने भी मेरठ में सुभारती अस्पताल में भर्ती कोविड रोगियों को व्यक्तिगत रूप से देखना आरम्भ कर दिया। जब परिवार में यह चर्चा उठी कि उनके पति डा. अतुल कृष्ण व पुत्र उनके द्वारा कोविड रोगियों को उनके द्वारा प्रतिदिन उनके पास जाकर देखा जा रहा है तो इस पर उन्होंने कहा कि कोविड रोगियों को डाक्टरी इलाज के साथ यह एहसास भी कराया जाना चाहिये कि वो सुभारती परिवार का ही हिस्सा है जिससे उनका मनोबल बढ़ेगा। यूं तो डा. कृष्णा मूति व डा. अतुल कृष्ण पूरी सावधानी रखते थे कि उनके माध्यम से कोविड़ वायरस घर में न आ सके परन्तु फिर भी लगता है कि कहीं चूक हो गयी और 25 अप्रैल को टेस्ट कराने पर ज्ञात हुआ कि डा. मुक्ति भटनागर को कोविड रोग हो गया है। उनका अविलम्ब अच्छे से अच्छा इलाज आरम्भ कर दिया गया। आरम्भ में तो उनकी दशा में सुधार आता गया और 10 मई को वह कोविड़ निगेटिव हो गई। एक सप्ताह ठीक रहने के बाद उन्हें दोबारा से बुखार एवं कोविड़ के अन्य लक्ष्ण प्रतीत हुए। उनका पुनः इलाज शुरू कर दिया गया। धीरे-धीरे उनका रोग बढ़ता गया और उनकी एक ओर रक्त में जमने की शक्ति कम हो रही थी तो दूसरी ओर शरीर के कुछ हिस्सों में रक्त जमने लगा। उसके बाद उनके जिगर ने काम करना कम कर दिया और उनके फेफड़ो ने भी कार्य कम कर दिया जिससे उनके रक्त ने ऑक्सीजन की मात्रा कम होने लगी। उन्हें गंभीर अवस्था में अस्पताल में भर्ती किया गया। उनकी पूरी इलाज की व्यवस्था की गई। अस्पताल में उन्हें कई बार सामान्य दवाओं के अतिरिक्त प्लाजमा थेरेपी भी दी गई तथा रक्त भी दिया गया परन्तु कोविड़ से उत्पन्न हुए रक्त की व्याधियों पर काबू नहीं पाया जा सका। संघमाता डा.मुक्ति भटनागर ने दुनिया को अलविदा कह दिया। संघमाता डा.मुक्ति भटनागर का दुनिया से विदा होना सुभारती परिवार के साथ पूरे देश के लिये अपूरणीय क्षति है। ईश्वर दुख की इस घड़ी में हम सब को सहन करने की शक्ति प्रदान करें।

मांगल्या प्रेक्षागृह में साय 4 बजे शोक सभा का आयोजन किया गया। बौद्ध विद्वान ने शान्ति पाठ किया। एमटीवी सुभारती ट्रस्ट के अध्यक्ष डा. हिरो हितो, कुलपति डा. वी.पी. सिंह, प्रतिकुलपति डा. विजय वधावन, मेडिकल कॉलिज के प्राचार्य डा. ए.के.श्रीवास्वत, डा.वैभव गोयल भारतीय, डा. नीरज कर्ण सिंह, एसी पाठक आदि सहित विश्वविद्यालय के सभी संकायों एवं विभागों सहित अन्य पदाधिकारियों व कर्मचारियों ने दो मिनट का मौन रखते हुए दिवंगत की आत्मा की शान्ति हेतु प्रार्थना की।

 

डा. मुक्ति भटनागर

डा. मुक्ति भटनागर

का विस्तृत परिचय…..

डॉ. मुक्ति भटनागर, एक गतिशील, बहुमुखी, करिश्माई और बहुआयामी व्यक्तित्व की धनी चिकित्सा की प्रोफेसर थी। उनका जन्म 16.01.1957 को उत्तर प्रदेश के पवित्र शहर इलाहाबाद में शिक्षाविदों, डॉक्टरों और सिविल सेवकों के एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। उन्होंने मोती लाल नेहरू मेडिकल कॉलिज इलाहाबाद से स्नातक एमबीबीएस और स्नातकोत्तर सामान्य चिकित्सा में एमडी पूरा किया।
उन्होंने मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य में स्नातकोत्तर डिप्लोमा और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय नई दिल्ली से वृद्धावस्था चिकित्सा में विशेषज्ञता प्राप्त करके अपनी गतिशील योग्यताओं में वृद्धि की। वह एक प्यार करने वाली माता व शिक्षिका थी। उन्हें कई बार सुभारती मेडिकल कॉलेज की सर्वश्रेष्ठ शिक्षिका के रूप में चुना गया। वह एक शानदार शोध मार्गदर्शिका रही हैं और 65 से अधिक राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय कार्यशालाओं और सम्मेलनों में वैज्ञानिक सत्रों में भाग लिया व अध्यक्षता की। उन्हें ’सार्क’ सदस्य देशों की एक भव्य सभा में “बुजुर्गों में शारीरिक विकलांगता“ और “शारीरिक पुनर्वासः वृद्धावस्था में विकलांगता“ पर व्याख्यान प्रस्तुत करने का सबसे प्रतिष्ठित गौरव प्राप्त है।
शिक्षा, स्वास्थ्य और समाज सेवा के क्षेत्र में उनकी समर्पित सेवाओं के सम्मान में उन्हें ’यू.पी. बुद्धिजीवियों के अखिल भारतीय सम्मेलन द्वारा ‘यूपी रत्न‘ दिया गया। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर उन्हें यू.पी. से ’दी वूमेन प्राईड सम्मान’ मिला। फिल्मस फोटो जर्नलिस्ट वेलफेयर एसोसिएशन (रजि.) महिला उत्थान और सशक्तिकरण के लिए उनकी प्रतिबद्धता हेतु उन्हें राष्ट्रीय एकता और आर्थिक परिषद नई दिल्ली द्वारा “राजीव गांधी शिरोमणि पुरस्कार“ से सम्मानित किया गया।
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर उन्हें ’महिला कल्याण के लिए सेवाएं’ के लिए सी.सी.एस.यूनिवर्सिटी मेरठ द्वारा सम्मानित किया गया। राष्ट्रीय चिकित्सा मंच पर वह एमसीआई की सदस्य रही हैं। उन्होंने कोयंबटूर, भारत में “हिप्पोक्रेटिक शपथ- वर्तमान चिकित्सा परिदृश्य में पुनरीक्षण“ पर एक अतिथि व्याख्यान प्रस्तुत किया और बहुत प्रशंसित एपीआई मेडिकल अपडेट वॉल्यूम में लेखक रही।
वह समाज के निचले वर्गो के उत्थान हेतु एक विशेष चिंता के साथ एक परोपकारी और सामाजिक कार्यकर्ता रही हैं। वह ग्रामीण-प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों के लिए प्रशासनिक समिति की कार्यकारी सदस्य (मानद) रही है। वह उन अग्रदूतों में से एक हैं जिन्होंने समाज सेवा और समानता के लिए सुभारती आंदोलन शुरू किया वह एमटीवी सुभारती ट्रस्ट की संस्थापक अध्यक्ष हैं। उन्होंने मेरठ एवं देहरादून में विश्वविद्यालयों की स्थापना की और ट्रस्ट के तहत कई स्कूल व चिकित्सा केन्द्रों के माध्यम से सामाजिक सेवाएं प्रदान करने में सक्रिय रूप से शामिल रही। एक और परियोजना जो उनके दिल के बहुत करीब रही वह मजदूरों के बच्चों की शिक्षा है जिसमें ग्रामीण व शहरी क्षेत्र में श्रमिक कल्याण केन्द्र स्थापित किये गये है।
भारत में बौद्ध अध्ययन के लिए उनके संरक्षण को ध्यान में रखते हुए उन्हें 2018 में म्यांमार की सर्वोच्च संघ परिषद के महासचिव परम पावन संदिमार अभिवंश द्वारा म्यांमार में आमंत्रित किया गया और उन्हें संघ माता की उपाधि प्रदान की।

शोकाकुल परिवार में डा.अतुल कृष्ण बौद्ध, डा. शल्या राज, डा. रोहित रविन्द्र, डा. कृष्णा मूर्ति, डा. आकांक्षा, अवनि, राहुल है।

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